Tuesday, November 24, 2009

एक खूबसूरत शाम में, न जाने कहाँ से,
ये कमबख्त ग़म का बादल चला आया ।
क्या इसे नहीं मालूम, यहाँ इसकी जगह नहीं॥

यहाँ तो हर तरफ़ हैं रंग,
लाल हरे पीले गुलाबी,
फिर क्यों इन्हे बेवजह भिगोने चला आया।
शायद ये भी दिल का बोझ, जो बरसों से लिए घूमा,
बरसा के उसको बूंदों में, उमींदों को लिए आया॥

आज क्यों नहीं तुम भी,
बरस जाने दो हर बादल को, जो दिल पे रख के बैठे हो।
बहा दो वो हरेक आंसू, नमी से जिसकी डरते हो।
फिर आखें खोलकर जो इस, दुनिया पर नज़र डालोगे,
यूँही छंट जाएगी वो सब धुंध, जो घेरे थी तुम्हे अब तक,
कुछ और ही नज़र आयेंगे ये सब रंग,
लाल हरे पीले गुलाबी॥

3 comments:

  1. my first blog and my first poem too. So please feel free to comment

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  2. My hindi is not as good as it used to be...but its definitely refreshing :)

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